हरियाणा प्रदेश की भू-आकृतिक संरचना
Haryana Gk Part 01
हरियाणा प्रदेश घग्घर और यमुना नदियों के मध्य स्थित एक विशाल समतल मैदानी भाग है तथा राज्य के केवल उत्तर पूर्वी भाग में पंचकुला जिले में शिवालिक श्रेणियों तथा दक्षिणी भाग में फरीदाबाद, गुड़गाँव, रेवाड़ी तथा महेन्द्रगढ़ जिलों में अरावली पर्वत की अवशिष्ट पहाड़ियाँ पाई जाती हैं। इन दोनों उच्च भूमियों के मध्य यह सपाट विशाल मैदान विस्तृत है। इसकी रचना हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा हजारों वर्षों की अनवरत निक्षेपण क्रिया से हुई है। इस मैदान की ऊँचाई समुद्रतल से 200 से 300 मी है। इसका सामान्य ढाल पश्चिम-दक्षिण, पश्चिम की ओर है। हरियाणा का लगभग 93.76% भाग समतल एवं तरंगित मैदान है, जो सामान्यतः घग्घर-यमुना का मैदान के नाम से जाना जाता है।
इसकी ऊँचाई लगभग 300 मी से कम है। इस मैदान का 68.21% भाग सपाट समतल मैदान है और 25.55% भाग तरंगित तथा उर्मिल मैदान है, जिसमें बीच-बीच में पहाड़ियों के ठूंठ (Stumps) और रेत के टीले पाए जाते हैं। राज्य का 3.09% भाग पहाड़ी एवं चट्टानी है, जो अरावली पर्वत की अवशिष्ट पहाड़ियों के रूप में विस्तृत है। इस भाग की समुद्र तल से ऊँचाई 300 मी से अधिक है। राज्य के लगभग 1.67% भाग पर शिवालिक पर्वत श्रेणियाँ स्थित हैं।
हरियाणा एक है, 44,212 किमी में विस्तृत है। यह पूर्व प्रदेश, पश्चिम पंजाब, में हिमाचल प्रदेश तथा दक्षिण राजस्थान घिरा हुआ है। यह पंजाब मैदान के दक्षिणी भाग 27°39′ उत्तरी अक्षांश 30°55′ अक्षांश तथा 74° 28′ पूर्वी देशान्तर 77° पूर्वी देशान्तर के मध्य अवस्थित है। हरियाणा में शिवालिक पहाड़ियाँ तथा में यमुना नदी है। राज्य दक्षिण-पश्चिमी सीमा अरावली पर्वतमाला स्थित जो दक्षिणी और गुड़गाँव जिले से अलवर फैली हुई है। घग्घर राज्य पश्चिम में बहती है।
इसकी ऊंचाई 300-400 मी तक हैं ये श्रेणियों पंचकुला, अम्बाला और यमुनानगर जिलों में स्थित है। इस क्षेत्र को गिरिपाद मैदान (Piedmont Plain) भी कहते हैं। हरियाणा के 1.38% भाग में उप शिवालिक तथा शिवालिक की पहाड़ियों का विस्तार है जिसको समुद्र तल से औसत ऊँचाई 300-600 भी है। कहीं-कहीं यह 600 मी से भी अधिक ऊँचे हैं। राज्य में शिवालिक की पहाड़ियाँ 0.56% भाग पर और उप-शिवालिक पहाड़ियाँ 0.92% भाग पर विस्तृत है।
भूगोलवेत्ता डॉ. जसबीर सिंह के अनुसार हरियाणा को मुख्यतः आठ भू-आकृतिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है। इसका विवरण उन्होंने अपनी पुस्तक, ‘An Agricultural Geography of Haryana में दिया है।
1. शिवालिक
2. जलोढ़ मैदान
3. बालुका टिब्बे युक्त मैदान
4. तरंगित बालू मैदान
5. गिरिपाद मैदान
6. बाढ़ का मैदान
7. अरावली का पथरीला प्रदेश
8. अनकाई दलदल
1. शिवालिक [Haryana Gk]
हरियाणा में शिवालिक पहाड़ियों का विस्तार राज्य के उत्तरी-पूर्वी भाग में है। इस भाग में मुख्य रूप से अम्बाला, पंचकुला तथा यमुनानगर के उत्तर-पूर्वी भाग आते हैं। ये शिवालिक पहाड़ियां हिमालय की बाहरी पर्वत श्रेणियों का निर्माण करती है ये हिमालय पर्वत-क्रम की नवीनतम रचना है, जो उत्तर अभिनूतन काल में हुए हिमालय के तृतीय और अन्तिम उत्थान के रूप में निर्मित हुई है। शिवालिक पर्वत श्रेणियों की ऊँचाई 900-2300 मी तक है। घग्घर, मारकण्डा, सरस्वती आदि नदियों का निकास इन्हीं पर्वत श्रेणियों से होता है। शिवालिक का निर्माण हिमालय के दक्षिण में स्थित संकरी खाई के तल का नदियों द्वारा हुए निक्षेपण के फलस्वरूप ऊपर उठने से हुआ है। ऊंचाई के आधार पर शिवालिक श्रेणियों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है (1) उच्च शिवालिक श्रेणियों ( 600 मी से अधिक) तथा (ii) निम्न शिवालिक श्रेणियाँ (400-600 मी) 1
इन शिवालिक श्रेणियों को रचना रेत, चौका, बजरी तथा संगुटिकाइम से हुई है। ढाल की तीव्रता के कारण इन पहाड़ियों का नदियों द्वारा अत्यधिक अपरदन हुआ है। पंचकुला से 30 किमी दूर स्थित हरियाणा की सबसे ऊंची मोरनी पहाड़ियाँ है। इनकी ऊँचाई समुद्र तल से 1.514 भी है। मोरनी पहाड़ियों की सर्वोच्च चोटी करोह है।
2. जलोढ़ मैदान [Haryana Gk]
उच्च भूमि वाले इस जलोढ़ मैदान का विस्तार शिवालिक के गिरिपाद से अरावली तक तथा घरघर और यमुना नदियों के मध्य हुआ है. जिन्हें बांगर कहा जाता है। यह मैदान यमुनानगर, अम्बाला, करनाल, कैथल, कुरुक्षेत्र, सोनीपत, पानीपत, जीद, रोहतक, सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, फरीदाबाद, मेवात तथा गुड़गांव जिलों में विस्तृत है। इस मैदान का ढाल अत्यन्त मन्द है तथा यह उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। चोटांग, सरस्वती, मारकण्डा इस मैदान में प्रवाहित होने वाली प्रमुख नदियों है। इस मैदान को ऊंचाई सामान्यतः 220-280 मी है।
3. बालू के टिब्बे युक्त मैदान [Haryana Gk]
बालू से युक्त यह मैदान हरियाणा व राजस्थान के पश्चिमी भागों में फैला हुआ है, जिसमें हरियाणा के भिवानी, हिसार, झज्जर, रेवाड़ी तथा महेन्द्रगढ़ जिले आते हैं। राजस्थान से प्रवाहित होने वाली शुष्कोष्ण पवनों द्वारा कच्छ की ओर से लाई गई बालू से युक्त मिट्टियों के निक्षेपण से इस क्षेत्र में बालू के टिब्बों का निर्माण हुआ है, जो पवन प्रवाह की दिशा में आगे की ओर खिसकते रहते है। इन टिब्बों की ऊँचाई 3 मी से 15 मी तक होती है। इन टिब्बों के मध्य में निम्न स्थल पाए जाते हैं, जिन्हें ताल कहा जाता है। वर्षा ऋतु में इन तालों में जल भर जाता है, जिससे अस्थायी छिछली झीलों का निर्माण होता है। इन झीलों को ठांठ या बावड़ी कहा जाता है। बालू की अधिक मात्रा के कारण यह मैदान अनुपजाऊ है। इस मैदान का भूमिगत जल नोचा और खारा है। बालू को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वृक्षों की हरित पट्टी लगाई गई है।
4. तरंगित बालू मैदान [Haryana Gk]
तरंगित बालू मैदान
हरियाणा के दक्षिणी भाग में, मुख्यतः महेन्द्रगढ़, रेवाड़ी तथा गुड़गाँव में स्थित इस मैदान में अरावली पहाड़ियों के आस-पास बालू का जमाव मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे रेत रूपी समुद्र से पहाड़ियाँ बाहर की ओर निकली हुई हो। ये कम विस्तृत तरंगित मैदान है। जिनका निर्माण वायु को निक्षेप क्रिया द्वारा हुआ है। इनमें यत्र-तत्र कटकों के मध्य गर्त भी मिलते हैं जिनमें वर्षा का जल भर जाता है, रे के अतिरिक्त कहाँ-कहाँ इस मैदान में रेत तथा कंकड़युक्त जलोढ़ मिट्टी के निक्षेप भी मिलते हैं।
5. गिरिपाद मैदान [Haryana Gk]
इस मैदान का विस्तार युमना से घग्घर नदी तक अम्बाला, यमुनानगर तथा पंचकुला जिलो में हुआ है जी शिवालिक पहाड़ियों के दक्षिण में 25 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में है। यह शिवालिक पहाड़ियों तथा हरियाणा के मैदानी भाग के मध्य एक संक्रमण क्षेत्र के रूप में स्थित है। इस मैदान को स्थानीय भाषा में घर कहा जाता है। शिवालिक पहाड़ियों से निःसृत बारहमासी नदियों द्वारा इस मैदान में बने गहरे खड्डे को पहाड़ी भाषा में चो कहा जाता है। इन नदियों द्वारा भारी मात्रा में कंकड़, पत्थर, रेत, बजरी आदि बहाकर लाया जाता है, जिनके निक्षेपण से इस मैदान के दक्षिण भाग में जलोढ़ पंखों का निर्माण हुआ है। इस मैदान का यह भाग अपेक्षाकृत कम उपजाऊ है तथा इसका ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की तरफ है। गिरिपाद या पर्वतपदीय मैदान की औसत ऊंचाई 300-375 मी है।
6. बाढ़ का मैदान [Haryana Gk]
इस मैदान का निर्माण यमुना और उसकी सहायक नदियों द्वारा हरियाणा के पूर्वी भाग में हुआ है। यमुना हरियाणा के पूर्वी किनारे यमुनानगर से फरीदाबाद तक प्रवाहित होती है। इस तरंगित मैदान में अन्तन्धित घाटी मार्ग तथा दलदल पाए जाते हैं। हरियाणा के उत्तर-पश्चिम भाग में भी मारकण्डा तथा घरघर नदियों द्वारा बाढ़ का मैदान निर्मित हुआ है। मारकण्डा द्वारा निर्मित बाद के मैदान को बेट तथा घग्घर द्वारा निर्मित बाढ़ के मैदान को नली कहते हैं।
7. अरावली का पथरीला प्रदेश [Haryana Gk]
हरियाणा का यह भाग अरावली की अवशिष्ट पहाड़ियों का मात्र विस्तार है। हरियाणा के दक्षिण में अवस्थित इस मैदान के अन्तर्गत फरीदाबाद, महेन्द्रगढ़, मेवात, रेवाड़ी, भिवानी तथा गुड़गाँव जिले आते हैं। अरावली की अवशिष्ट श्रेणियों के कारण यह क्षेत्र उबड़-खाबड़ है। इस क्षेत्र का सबसे ऊँचा भाग नारनील नगर के दक्षिण-पश्चिम में कुलताजपुर गाँव में स्थित है जो 652 मी ऊंचा है तथा इसे ढाँसी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। अरावली का दूसरा भाग एक निम्न श्रेणी के रूप में दिल्ली के धौला कुआँ से करोल बाग होता हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय तक विस्तृत है। अरावली के इस भाग को दिल्ली में दिल्ली कटक या दिल्ली रिज कहा जाता है। इस पथरीले मैदान की ऊँचाई समुद्रतल से 225-500 मी तक है। इन पहाड़ियों को तलहटी में जमा शैल मलबा, पिण्ड-विच्छेदन के रूप में सूर्यातप द्वारा यान्त्रिक अपरदन की निरन्तर सक्रियता को सिद्ध करते हैं।
8. अनकाई दलदल [Haryana Gk]
अनकाई दलदल हरियाणा के पश्चिमी जिले सिरसा के दक्षिणी भाग में पाया जाता है। यह क्षेत्र हरियाणा का सबसे कम ऊंचाई वाला भाग है। इस क्षेत्र की ऊंचाई समुद्रतल से 200 मी से भी कम है। धरातल के मन्द दाल के कारण जल प्रवाह में अवरोध पैदा हो जाता है, जिसके कारण इस दलदल का निर्माण हुआ है। सिरसा का नैली क्षेत्र कम उचला तथा चौड़ा है।

